माँ विन्ध्यवासिनी के पावन चरणों के तले उनके आंचल की शीतल छाया में पुष्पित एवं पल्लवित होते बाबू लाल जायसवाल इण्टर कालेज का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस विद्यालय की स्थापना सन् 1842 ई0 में हुयी थी । यह ” लन्दन मिशनरी सोसाइटी (L,M.S.)” के द्वारा स्थापित किया गया था। यह प्रान्त का दूसरा सबसे प्राचीन विद्यालय है। यह विद्यालय केवल हाईस्कूल तक था । इसका नाम “लन्दन मिशन स्कूल” था। यह विद्यालय विगत 176 वर्षों से समाज की सेवा कर रहा है।
एक समय था कि इसका अध्यापक होना और इसकी प्रबन्ध समिति का सदस्य होना गौरव की बात समझी जाती थी । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल यहाँ पर कला के अध्यापक थे । प्रयाग विश्वविद्यालय के भूतपूर्व रजिस्टार स्व0 के0 पी0 मोहिले इसके प्रधानाचार्य थे। इस विद्यालय ने कितने ही प्रशासक, इंजीनियर, विधायक, सांसद, डॉक्टर आदि दिये है । स्वतंत्रता संग्राम में भी इसका योगदान कम नहीं था। यहाँ का एक कक्षा-9 का छात्र नरेश चन्द्र श्रीवास्तव ई0 1842 की क्रान्ति में शहीद हुआ था ।
सन् 1870 ई० में यह विद्यालय इण्टरमीडिएट तक हो गया और इसको कलकत्ता विश्वविद्यालय की मान्यता मिली हुयी थी, मगर विद्यालय को यह सम्मान 3 वर्ष के लिए ही प्राप्त हुआ । पुनः यह हाईस्कूल में तब्दील हो गया। सन् 1922 में मिशनरी ने बगल में ही हरिजन बस्ती को लैण्ड एक्वीजिशन एक्ट के तहत विद्यालय के लिए अधिगृहीत किया और सरकार ने 2000 रू० का अनुदान भी स्वीकृत किया। जिससे उस बस्ती -भगौती प्रसाद प्रवक्ता एम. ए. एड. के जीर्ण-शीर्ण मकानों को ढहाकर विद्यालय के लिए मैदान बनाया गया और छात्रों को खेलने आदि की सुविधा प्रदान की गयी। विद्यालय के चारों ओर बाउण्ड्री बनायी गयी तथा मुख्य गेट से थोड़ा पूर्व की तरफ एक दूसरा गेट और बनाया गया जिससे विद्यालय की शोभा और बढ़ गयी ।
माँ विन्ध्यवासिनी के पावन चरणों के तले उनके आंचल को शीतल छाया में पुष्पित एवं पल्लवित होते बाबू लाल जायसवाल इण्टर कालेज का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। यह विद्यालय कला, साहित्य, संगीत, ज्ञान-विज्ञान एवं दर्शन का अटूट भण्डार है जो अपनी प्राचीन परम्पराओं का निर्वहन करते हुये अपनी मर्यादा बनाये रखा है। शिक्षा ही वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य के सिद्धान्त और विचार-धाराओं की परम्परा को कायम रखा जा सकता है। यह उसके बौद्धिक एवं नैतिक विकास का माध्यम है इसी के द्वारा लोगों के विचारों का आदान-प्रदान होता है। वास्तव में अच्छी शिक्षा ही प्रगति का माध्यम है और शिक्षित जनता ही किसी भी संस्कृति का प्रतीक बन यश को प्राप्त कर गौरवान्वित हो सकता है। केवल ज्ञान प्रदान करना ही शिक्षा का उद्देश्य नहीं बल्कि रचनात्मक कार्यों के द्वारा छात्रों का बहुमुखी विकास करना भी है। हमारे विद्यालय की महत्वपूर्ण विशेषता उसकी बाह्य संरचना का गठन नहीं है बल्कि ऐसी शैक्षिक क्रियाओं का समावेश है जिसके द्वारा छात्रों में मानवता धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता के प्रति चेतना एवं आस्था उत्पन्न हो सके और उनके अंदर तर्कसंगत वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास हो सके।
अति प्राचीन से विन्ध्य क्षेत्र एवं पतित पावनी माँ गंगा तट पर अवस्थित इस विद्यालय में प्रधानाचार्या के पद का गुरुतर दायित्व मुझे प्राप्त है। विद्यालय में निरन्तर श्रम करते हुए शिक्षक के रूप में प्राप्त अनुभवों को विद्यालय की सेवा मे समर्पित करने का सुअवसर निश्चित रूप से विद्यालय को सर्वोत्कृष्ट सोपानों पर पहुँचाने का कार्य करेगा। विद्यालय ज्ञान एवं शिक्षा का मंदिर होता है और इसमें शिक्षक का स्थान सर्वोपरि होता है। आधुनिक युग मे यह भाव विलुप्त हो रहा है। आज की पाश्चात्य सभ्यता में बच्चों के चरित्र में आ रही गिरावट को देखते हुए हम सभी का यह कर्तव्य एवं दायित्व है कि बच्चों में चरित्र निर्माण का कार्य प्राथमिकता के आधार पर करें। ‘शिक्षा के बिना किसी व्यक्ति, समाज, राष्ट्र की उन्नति संभव नहीं, इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल बौद्धिक ज्ञान’ प्रदान करना ही नहीं बल्कि छात्रों का सर्वांगीण विकास करना है जिसके द्वारा वह अपनी समस्त अभिव्यक्तिओं एवं विचारों को सशक्त रूप से प्रस्तुत कर सकें।
छात्रों के बहुमुखी विकास के लिए हमारे विद्यालय मे योग्य शिक्षक एवं समस्त संसाधन उपलब्ध है। उत्कृष्त प्रयोगशाला, प्राकृतिक एवं सुसज्जित परिसर, शुद्ध पेयजल, व्यवस्थित शिक्षण कक्ष, बोर्ड एवं बहुमुखी प्रतिभा के धनी समस्त शिक्षक गण अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार छात्र हित एवं विद्यालय के लिए निरन्तर समर्पित रहते हैं ।।
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